मैं. डॉ. सुनीता भार्गव प्राचार्य संजय शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, लालकोठी स्कीम, जयपुर में कार्यरत हूँ मेरी योग्यता एम.एम. (मनोविज्ञान, संस्कृत) एम.एड. शिक्षा में पीएच.डी., अध्यापन अनुभव पी.जी. – 13 वर्ष, यू.जी. – 26 वर्ष, राजस्थान विश्वविद्यालय की रजिस्टर्ड शोध निर्देशिका एवं 3 पीएच.डी. मेरे निर्देशन में अवार्ड हो चुकी हैं।
मेेरे द्वारा 5 पुस्तकें प्रकाशित की जा चुकी है मैं वर्तमान में राजस्थान विश्वविद्यालय की शिक्षा संकाय के बी.ओ.एस. की संयोजिका हूँ।

व्यक्ति सदैव से अपने बाह्य वातावरण की वस्तुओं, व्यक्तियों तथा अन्य पदार्थो में क्रिया-प्रतिक्रिया, रूचि लेकर अपना जीवनयापन करता है, जैसे-जैसे व्यक्ति का परिचय वातावरण के साथ बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे उसके ज्ञान-भण्डार में वृद्धि होती जाती हैं। जीवन में एक ऐसी तत्परता रखता है कि वे निरन्तर कोई न कोई क्रिया करता रहे, जिससे कुछ न कुछ उसके द्वारा भला कार्य होता रहे।
प्रतिक्षण और अधिक उदान्त व्यक्ति बनने और अपनी आत्मा की पवित्रता विकसित करने के लिये यदि प्रयत्नशील है, तब यह कहा जा सकता है कि आपके जीवन की दिशा सही है। बालक का जब जन्म होता है तो उसका लालन पालन करने हेतु परिवार होता है तत्पश्चात् अध्ययन करने हेतु जाता है तो विद्यालय होता है।
अतः उसे अपने घर, घर से बहार प्रकृति के प्रांगण में तथा बाह्य समाज तथा विद्यालयों के माध्यम से विभिन्न प्रकार के ज्ञान-अनुभव प्राप्त होते रहते है। बालक बाहरी वातावरण से सीखे अनुभव एवं आन्तरिक वातावरण अर्थात् अपनी इच्छाओं, प्रवृत्तियों, सुखःदुख कल्पना आदि के विषय में भी अधिकाधिक जानकारी प्राप्त करना चाहता है।
घर पर माता-पिता, विद्यालय में शिक्षक मुख्य रूप से भूमिका का निर्वाह करते है। यदि शिक्षक और माता-पिता बालक के बारे में ये नहीं जानते है कि बालक क्या चाहता है?
वे ये समझ नहीं पाते कि हमें बालक को योग्यताओं के अनुसार उसके व्यक्तित्व एवं जीवन का निर्माण करना चाहिए यदि बालक के रूचि, इच्छाओं योग्यताओं का ज्ञान नहीं होता था बालक का सर्वांगीण विकास करने में अपने आपको असफल पाते है।
अतः मेरा मानना है कि मनोविज्ञान का ज्ञान एक शिक्षक और माता-पिता को होना ही चाहिए क्योंकि मनोविज्ञान का क्षेत्र हर जगह व्याप्त है।
मनोविज्ञान का अध्ययन 16वीं शताब्दी से होता आ रहा है किन्तु मनोविज्ञान दर्शनशास्त्र का ही अभिन्न अंग माना जाता था। 18वीं शताब्दी के अन्त में मनोविज्ञान
विद्यालय के रूप में प्रारम्भ हुआ।
शाब्दिक अर्थ के रूप में च्ेलबीवसवहल शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों के मेल से बना है, च्ेलबीम ़सवहने आत्मा एवं शास्त्र अर्थात् आत्मा के सम्बन्ध में विचार-विमर्श करना। 16वीं सदी में आत्मा का विज्ञान। इसको मानने वाले प्लेटो, अरस्तु आदि का नाम जाना जाता है। किन्तु इसका कोई सटीक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि न आत्मा दिखाई देती, न स्वरूप तो विज्ञान किस रूप में कहा जा सकें। आत्मा अमूर्त है कोई अध्ययन नहीं किया जा सकता है।
मनोविज्ञान को 17वीं सदी के मन का विज्ञान माना जाने लगा। इसमें भी आत्मा जैसी परेशानी का सामना करना पड़ा जिसका न रंग है न रूप है और न आकार है तो अध्ययन कैसे किया जा सकें? कुछ लोगों ने मन ;डपदकद्ध का विज्ञान कहा। डपदक तो हेाता है लेकिन उसका अध्ययन डॉक्टर के अलावा कोई नहीं करता है अतः इसको भी अपूर्ण ठहराया गया।
फ्रायड, जेम्स ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान कहा अर्थात् चेतना के तीन स्तर बताये –
1.) चेतन
2.) अर्द्धचेतन
3.) अचेतन
बहुत अच्छे तरीके से व्याख्या की गई किन्तु फिर भी मनोविज्ञान के लिए ये परिभाषा अपूर्ण ठहराई गई।
18वीं सदी के अन्त 19वीं सदी के प्रारम्भ में व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक वाट्सन ने मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान बतलाया अर्थात् वुडवर्थ का व्यक्तव्य है, ‘‘मनोविज्ञान ने पहले आत्मा त्यागी, फिर मन त्यागा, फिर चेतना, अन्त व्यवहार के ढंग को अपनाये हुए है।’’
व्यवहार क्रिया प्रतिक्रिया का कुल योग है जो मनुष्य या व्यक्ति जीवन के किसी वस्तु, व्यक्ति, विचार के प्रति करता है।
1. ) मनोविज्ञान एक विधायक विज्ञान है।
2.) मनोविज्ञान अनुभूति का अध्ययन है।
3.) मनोविज्ञान व्यवहार का अध्ययन है।
4.) मनोविज्ञान व्यवहार की व्याख्या अनुभूति के माध्यम से करता है।
अर्थात् एक शिक्षक एवं पारिवारिक सदस्यों को बालक के व्यवहार का अध्ययन करना चाहिए। जिससे बालक के व्यक्तित्व को सही दिशा मिल सकें।
1.) मानव व्यवहार द्वारा अत्यन्त जटिल होता है उसको समझने के लिए परिस्थितियों का अध्ययन करना चाहिए।
2.) मानव के व्यवहार को नियंत्रित करना चाहिए।
3.) व्यवहार का अवलोकन कर भविष्यवाणी की जा सकती है।
4.) व्यवहार के परिमाणात्मक पक्ष में गुणात्मक पक्ष दोनों का अवलोकन किया जाना चाहिए।
5.) बालकों की क्रिया-प्रतिक्रिया के संगठित रूप का अध्ययन करना चाहिए।
6.) बालक यदि झूठ बोल रहा है तो उसे तुरन्त डांटे या फटकारे नहीं उसके झूठ बोलने के कारण का पता लगाये।
7.) बालक की रूचि, इच्छायें, आकांक्षाऐं एवं संवेगों का ध्यान रखते हुए उनके अध्ययन में सहायता करें।
8.) बालक को छोटा समझकर उनके सामने न कहे जाने वाली बात उजागर न करें वे बहुत ध्यान से बातें समझते हैं। यदि उनके अनुरूप कोई बात नहीं मानी जाती है, तो वे गूढ़ मूल्यांकन भी कर लेते है।
9.) बालक के व्यवहार को सही दिशा न मिलने के कारण ही उनमें कुण्ठा, चिन्ता, दबाव रोग उत्पन्न हो जाते है।
निष्कर्षतः शिक्षकों एवं माता-पिता को बालक के बचपन से व्यवहार को समझना चाहिए। बालक व्यवहार कैसा भी करें यदि माता पिता उसके व्यवहार के लक्षणों को सकारात्मक लेते हुए अवलोकन करेंगे तो उनके जीवन में नकारात्मक लक्षण नहीं रहेंगे। उनके स्वास्थ्य का सर्वांगीण विकास होगा। हंसमुख, प्रसन्न चित्त एवं चिन्तामुक्त व्यक्तित्व उभर कर आयेगा।
वर्णों पर ध्यान दो, शब्द बन जाते है।
शब्दों पर ध्यान दो, वाक्य बन जाते है।
वाक्यों पर ध्यान दो, व्यवहार बन जाता है।
व्यवहार पर ध्यान दो, आदत बन जाती है।
आदत पर ध्यान दो, चरित्र बन जाता है।