मनोविज्ञान की प्रकृति

‘‘मनोविज्ञान, जीवनगत प्रत्येक प्रकार की सभी परिस्थितियों के प्रति प्राणी-प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करता है।’’ चार्ल्स ई. स्किनर

Psychology deals with response to any and every kind of situation that life presents. – Charles E. Skiner

1.) मनोविज्ञान विधायक विज्ञान है।
2.) मनोविज्ञान शुद्ध विज्ञान है।
3.) मनोविज्ञान मानव व्यवहार का विज्ञान है।
4.) मनोविज्ञान न केवल मानव व्यवहार का अध्ययन करता है अपितु मानव व्यवहार को उद्दीप्त करने वाले विभिन्न तत्वों का अध्ययन करता हैं क्योंकि मानव व्यवहार को करने हेतु विभिन्न तत्व प्रभावित करते हैं इस दृष्टि से मनोविज्ञान का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है।
5.) मनोविज्ञान अपने अध्ययन से सत्यापित करता है कि उसकी प्रकृति सार्वभौमिक, सार्वकालिक सर्वंदर्शीय तथा शाश्वत् है।
6.) शाश्वत् होने के साथ-साथ इसमें परिवर्तनशीलता भी है क्योंकि बदलता हुआ सामाजिक परिवेशयक्ति के व्यवहार को प्रभावित करता है जिसके कारण इसमें परिवर्तनशीलता आती है।
7.) मनोविज्ञान की परिवर्तनशील प्रकृति के कारण ही समय-समय पर इसकी परिभाषाओं को प्रभावित करती है अतः परिवर्तनशीलता के गुण के कारण ही यह एक सामाजिक विज्ञान है।
मानव व्यवहार को जन्मजात तत्व भी प्रभावित करते हैं और इन्हीं तत्वों के कारण मनोविज्ञान की प्रकृति में शाश्वतता भी बताई गई है मुख्य कारण जन्मजात गुण के आधार पर जो भविष्यवाणी की जाती है उसके आधार पर मनोविज्ञान को शुद्ध विज्ञान भी कहा गया है।
मनोविज्ञान की प्रकृति पर प्रकाश डालते है तो मन में निम्न प्रश्न उदीप्त होते हैं कि विज्ञान किसे कहें? क्या मनोविज्ञान शुद्ध विज्ञान और सामयिक विज्ञान दोनों हैं? व्यवहार क्या है? मानव व्यवहार कैसे करता है? मानव व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारक कौनसे हैं।
विज्ञान –
किसी भी विषय में विज्ञान शब्द जोड़ने पर निम्न पांच बातें अवश्य होनी चाहिए तभी उस विषय की सार्थकता सिद्ध होती है –
1.) निरीक्षण (Observation)
2.) आलेखन (Recording)
3.) वर्गीकरण (Classification)
4.) सामान्यीकरण (Generalization)
5.) सत्यापन (Verification)

कुछ विषयों में ये पाँचों बातें एक साथ मिल जाती है परन्तु सामान्यीकरण कभी शाश्वत् होता है जैसे गणित में 2 X 2 = 4, तो कभी परिस्थितियों के प्रभाव से सामान्यीकरण भी बदल जाता है यथा कोरोना काल से पूर्व हाथ मिलाकर अभिवादन करना या गले मिलना आत्मीयता एवं आधुनिकता समझी जाती थी किन्तु कोरोना काल में दूर से हाथ जोड़ना, अभिवादन करना और गले न मिलना भी आत्मीयता एवं जागरूकता समझी जा रही है।
विज्ञान को दो प्रकार से व्यक्त करते है –
1.) शुद्ध विज्ञान – जिन विषयों में सामान्यीकरण है अपरिवर्तनशील होता है जैसे – गणित, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान मनोविज्ञान आदि।
2.) सामाजिक विज्ञान – जिन विषयों के नियम, सामान्यीकरण परिस्थितियों के बदलने पर बदल सकते हैं। जैसे – इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र मनोविज्ञान आदि।
अतः मनोविज्ञान शुद्ध विज्ञान भी है सामाजिक विज्ञान भी है। निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है एक ओर मनोविज्ञान शुद्ध विज्ञान इसलिए है कि इसमें आदर्शो का अध्ययन न किया जाकर पदार्थ का अध्ययन किया जाता है। इसमें निरीक्षण, परीक्षण, सिद्धान्त-निरूपण तथा सत्यापन का स्थान विद्यमान है उदाहरण – प्रेरक, जिज्ञासा आवश्यकता के बिना किसी भी औपचारिक शिक्षा को सीखा नहीं जा सकता है।
3.) क्रोध से क्रोध उत्पन्न होता है।
4.) बुद्धि के बिना प्रतिभाशाली होना असम्भव है।
दूसरी ओर मनोविज्ञान शुद्ध विज्ञान न होकर सामाजिक विज्ञान इसलिये है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है समाज से अर्जित प्रेरक उसको प्रभावित करते है। सभी सिद्धान्त शाश्वत् नहीं है उनमें परिवर्तन सम्भव है

परिस्थितियों के बदल जाने पर सिद्धान्त भी बदल जाते है अग्रिम उदाहरण को लिया जाये तो क्रोध से क्रोध उत्पन्न होता है, परन्तु समय परिस्थिति अनुसार व्यक्ति बहुत अच्छे वातावरण से आ रहा है उसमें हर्ष, खुशी का संवेग, समझदारी की आदत, विवेक उसमें विद्यमान है तो स्वयं क्रोध करने से, पूर्व व्यक्ति विचार करता है कि मैं अकारण क्रोध क्यों करूँ?

सामने वाला व्यक्ति अपने आपको क्रोध उत्पन्न कर रहा है उससे उसे कोई लाभ नहीं होने वाला है अर्थात् समय परिस्थिति बदलते ही उदाहरणों में परिवर्तन आ जाता है दूसरा उदाहरण अधिगम जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है व्यक्ति जीवन के हर अनुभव से कुछ न कुछ सीखता है उसे आवश्यकता प्रेरक, जिज्ञासा की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन ये सीखना औपचारिक सीखने पर पूर्णतः लागू नहीं होता है उक्त उदाहरणों के माध्यम से मनोविज्ञान कहीं शुद्ध विज्ञान है, कहीं सामाजिक विज्ञान है

व्यवहार –

जैम्स डेªवर – मानव या पशुओं के जीवन में उपस्थित होने वाली परिस्थितियों के प्रति उनकी प्रतिक्रियाओं का समग्र रूप ही व्यवहार है।
“Behaviour is the total response which men or animals make to the situations in the life with which eiether are confronted.”
अर्थात् व्यक्ति किसी भी प्राणी, वस्तुओं, विचार के प्रति जो भी क्रिया-प्रतिक्रिया करता है। उस क्रिया प्रतिक्रियाओं का संगठित रूप ही व्यवहार कहलाता है।
मानव व्यवहार की उत्पत्ति –
सांख्य दर्शन के अनुसार समस्त विश्व की रचना 25 तत्वों से मानी जाती है इन तत्वों के दो भागों से मिलकर व्यक्ति बाह्य जगत में व्यवहार को प्रकट करता है। जो इस प्रकार है।

पुरूष अथवा आत्मा चेतन्य स्वरूप है न तो आत्मा ही किसी तत्व से बनती है और न उससे कोई तत्व बनता है प्रकृति के आठ भाग मूलप्रकृति, महत् (बुद्धि), अहंकार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध होते है उन आठ भागों से 16 विकारों की उत्पत्ति होती है।

सोलह विकार
1.) स्थूल भूत – क्षितिज, जल, पावक, गगन, समीर
2.) ज्ञानेन्द्रियाँ – आँख, नाक, कान, जीह्वा , त्वचा
3.) कर्मन्द्रियों – हाथ, पैर, मुँह (वाणी) उपस्थ एवं गुदा

मन

इसमें स्थूलभूत विकार मानव शरीर को नियंत्रण, कर्मशील बनाये रखने हेतु 5 प्रकृतियों का सम्बन्ध 5 ज्ञानेन्द्रियों से होता है जब ज्ञानेन्द्रियाँ, सम्बन्धित प्रकृति का अनुभव करती है तब वे इसकी सूचना मन को दे देती है।

मन उस परिस्थिति पर विचार करने के लिए बुद्धि का सहारा लेती है। साथ ही मूल प्रकृति एवं अहंकार भी उचित अनुचित का निर्णय लेने में बुद्धि का साथ देते हैं। परिणामस्वरूप जो भी निर्णय प्राणी लेने का प्रयास करता है उसकी सूचना पुनः मस्तिष्क को दे देता है और मस्तिष्क उसके अनुसार काम करने के लिए कर्मेन्द्रियों को आज्ञा देता है।

कर्मेन्द्रियों के द्वारा जो कार्य किये जाते है अर्थात् क्रिया प्रतिक्रिया का संगठित रूप व्यवहार कहलाते है अर्थात् हम कह सकते है किसी परिस्थिति के प्रति मानवीय प्रतिक्रियाएँ उसके व्यवहार के अन्तर्गत आती है।
व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारक –

मानव व्यवहार को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक निम्न है –
1.) जैवीय कारक
2.) वातावरणीय कारक
जैवीय कारक में – वंशानुक्रमणीय, बुद्धि, शरीर, संवेग आदि कारक इसके अन्तर्गत आते है।
वातावरणीय कारक – इनका भौतिक परिस्थितियों घर, पाठशाला और समाज में व्यक्ति बालकों के प्रति दूसरों की धारणा और व्यवहार आदि कारक आते है।

निष्कर्षतः मनोविज्ञान का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है हर मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता होती है। मनोविज्ञान विधायक विज्ञान है। इसका ज्ञान समस्त प्राणियों को होना चाहिए। जीवन के हर क्षेत्र को सामाजिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक एवं व्यवहारिक मनोविज्ञान प्रभावित करता है।

 

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